प्रगति को है विरह ज़रूरी,
तथ्य यह प्रकृति हर ओर दिखलाती है,
गऊ माता प्रदान दुग्ध इधर करती हैं,
जिगर का टुकड़ा बछड़ा उधर चरने को भटकता है,
बीज जिसे बोरियों में भर बिखेरते हर ओर तुम हो,
आखिर वह भी तो कभी किसी पौधे का अंश था,
हर प्रकार के हर नाप के सोफे तख्त बने जिस शीशम से,
उसकी भी उन्नति का मूल आधार आखिर विरह ही तो है,
देखो हर तरफ,
जैविक अजैविक कण इस धरा का,
बताती कहानी यही है,
हे युवा तुम अग्रसर हो,
मोह त्यागो,
लोभ छोड़ो,
धर्म को थामो,
कर्म को थामो,
सच्चाई को ना कमज़ोर मानो,
विरह से ना तुम डरो,
यह तो देवताओं की भी गाथा थी,
बस इसे कर्तव्य मुक्ति ना तुम समझना।।
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